. Sri Dasam Granth Sahib Verse
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Sri Dasam Granth Sahib Verse

ਸ੍ਰੀ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕੀ ਫਤਹ ॥

The Lord is One and the victory is of the Lord.

स्री वाहिगुरू जी की फ़तह ॥


ਜਾਪੁ ॥

Name of the Bani : Japu Sahib

जापु ॥


ਸ੍ਰੀ ਮੁਖਵਾਕ ਪਾਤਸਾਹੀ ੧੦ ॥

The sacred utterance of The Tenth Sovereign:

स्री मुखवाक पातिसाही १० ॥


ਛਪੈ ਛੰਦ ॥ ਤ੍ਵਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥

CHHAPAI STANZA. BY THY GRACE

छपै छंद ॥ त्वप्रसादि ॥


ਚਕ੍ਰ ਚਿਹਨ ਅਰੁ ਬਰਨ ਜਾਤਿ ਅਰੁ ਪਾਤਿ ਨਹਿਨ ਜਿਹ ॥

He who is without mark or sign, He who is without caste or line.

च्क्र चिहन अरु बरन जाति अरु पाति नहिन जिह ॥


ਰੂਪ ਰੰਗ ਅਰੁ ਰੇਖ ਭੇਖ ਕੋਊ ਕਹਿ ਨ ਸਕਤਿ ਕਿਹ ॥

He who is without colour or form, and without any distinctive norm.

रूप रंग अरु रेख भेख कोऊ कहि न सकति किह ॥


ਅਚਲ ਮੂਰਤਿ ਅਨਭਵ ਪ੍ਰਕਾਸ ਅਮਿਤੋਜ ਕਹਿਜੈ ॥

He who is without limit and motion, All effulgence, non-descript Ocean.

अचल मूरति अनभउ प्रकास अमितोजि कहिजै ॥


ਕੋਟਿ ਇੰਦ੍ਰ ਇੰਦ੍ਰਾਣਿ ਸਾਹੁ ਸਾਹਾਣਿ ਗਣਿਜੈ ॥

The Lord of millions of Indras and kings, the Master of all worlds and beings.

कोटि इंद्र इंद्राणि साहु साहाणि गणिजै ॥


ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਮਹੀਪ ਸੁਰ ਨਰ ਅਸੁਰ ਨੇਤਿ ਨੇਤਿ ਬਨ ਤ੍ਰਿਣ ਕਹਤ ॥

Each twig of the foliage proclaims: “Not this Thou art.”

त्रिभवण महीप सुर नर असुर नेति नेति बन त्रिण कहत ॥


ਤ੍ਵ ਸਰਬ ਨਾਮ ਕਥੈ ਕਵਨ ਕਰਮ ਨਾਮ ਬਰਣਤ ਸੁਮਤਿ ॥੧॥

All Thy Names cannot be told. One doth impart Thy Action-Name with benign heart.1.

त्व सरब नाम कथै कवन करम नाम बरणत सुमति ॥१॥