Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १२) ३४

३. ।राजे दा गुरू जी ळ मिलंा॥
२ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १२ अगला अंसू>>४
दोहरा: भई जामनी सतिगुरू, बैठे सैन सथान।
स्री गुजरी तबि आनि करि, कीनसि बिनै बखानि ॥१॥
चौपई: स्री प्रभु! हेतु तीरथनि आए।
रावर की संगति सभि थाएण।
अपनो देश छोरि करि आए।
बीच बिदेशन आनि बसाए ॥२॥
सभि को तागि इकाकी चले।
कोण भावति, इहु नांहिन भले।
बिछरहु आप दूर किस थान।
चहति इकाकी करो पयान ॥३॥
सगरे देश प्रभाअु१ तुमारा।
होहि दास धरि भाअु अुदारा।
जहि कहि माननीय जग मांही।
बंदनीय सभि देशनि जाहीण२ ॥४॥
तुमरे करि चिंता हम कोइ न।रावर को कैसे करि होइ न३।
तअू बिचारो निज मन मानि।
बिच बिदेश एकल चलि जानि ॥५॥
रावर की जननी तो सुनोण।
जथा तुमारे पित ने भनोण।
-धरम धुरंधर अधिक प्रतापी।
महां बीर शज़त्रनि गन खापी ॥६॥
राणकापति प्रकाश जग जैसे।
पुज़त्र आपके अुपजहि तैसे-।
अटल सफल, संसै जिन नांहि।
अस बच हैण खशटम पतिशाहि ॥७॥
नित चाहति चित पौत्र दुलारनि।


१प्रताप
२(जिज़थे जाणदे हो।
३आप ळ तां (चिंता) किसे तर्हां है ही नहीण।

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