Sri Gur Pratap Suraj Granth

Displaying Page 93 of 492 from Volume 12

स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १२) १०६

१३. ।अवतार दा अुतसाह॥
१२ॴॴपिछला अंसूततकरा रासि १२ अगला अंसू>>१४
दोहरा: सोढी कुल भूखन जनम,
पूस मास१ महि लीन।
हुती शुदी थिति सपतमी,
सुंदर समैण सु चीन ॥१॥
चौपई: जाम जामनी जबिहूं जानी।
सुर गन आन प्रशंशा ठानी।
बिथरी बर सुगंधि पुरि सारे।
जागति जे लखि बिसमै धारे२ ॥२॥
-अस सौरभ३ कबि प्रथम न पाई।
इह औचक अबि कित ते आई?
-श्री गुर मात* नानकी तबै।
शगन बिचार करहि शुभ सबै ॥३॥
-महां पुरश मम सुत के होवा।
जिस के जनमति शुभ ही जोवा-।
पति के बाक बिचारन करती४।
-कुल दीपक अुपजहि- मुद धरती ॥४॥
-श्री नानक कहु अुज़जल नामू।
करहि जगत सभि महि अभिरामू।
इम प्रसंन हुइ भाखो मोही।
साच बचन निशचै तिन होही- ॥५॥
अति अनद करती मन माहूं।
सुधि को पठनि हेतु सुत पाहूं।
करी पज़त्रिका तबहि लिखावनि।
तुम घर नदन निपजो पावन ॥६॥
भए शगुन तिह समै घनेरे।
जो प्रमोद दा अहैण बडेरे।१पोह दे महीने।
२असचरज होए।
३सुगंधी।
*पा:-माता बडी।
४माता जी याद करदे हन।

Displaying Page 93 of 492 from Volume 12