Sri Nanak Prakash

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१९. शारदा मंगल पलख, शालमली, कुश, कौच, शाख ते पुशकर दीप गमन॥
१८ੴੴ पिछला अधिआइ ततकरा अुतरारध - ततकरा पूरबारध अगला अधिआइ ੴੴ२०
{सज़त दीप} ॥३॥
{१ पलख दीप} ॥९..॥
{२ शालमली दीप} ॥२५..॥
{३ कुश दीप} ॥३४..॥
{४ क्रौच दीप} ॥४४..॥
{५ साख दीप} ॥५५..॥
{विशे, भजन अते गानानद} ॥६१..॥
{सरीर करम तरोवरु} ॥६४॥
{६ पुशकर दीप} ॥६८..॥
{७ जंबू दीप} ॥४, ७७ ॥॥ ॥२०॥
दोहरा: तम अज़गान बिनाशनी देति गान अुर नैन
श्री सरसती सुमति दा जै जै बसीऐ बैन ॥१॥
दा=दैं वाली सुमति दा=स्रेशट बुज़धी देण वाली
बैन=बचन, बाणी, काव-रचना
अरथ: हे सरसती! अज़गान (रूपी) हनेरे ळ विनाश करनेवाली! (जो) हिरदे दे
नैंां ळ गान (रूपी प्रकाश) देण हारी हैण (अते) स्रेशट बुज़धी दी दाता हैण,
तेरी जै हो जै हो (मेरी) बाणी विच आके वज़स जाओ
श्री बाला संधुरु वाच ॥
चौपई: कहि बाला श्री अंगद पासी
रुचिर कथा सुणीए सुखरासी!
स्री गुर सोण बोलो मरदाना
सभि ही दीप१ दिखाअु महाना ॥२॥
इह लालस मेरे मन मांही
दोखौण सपत दीप जो आही {सज़त दीप}
सरब प्रकार समरज़थ सुआमी
जहिण चाहअु तहिण के तुम गामी२ ॥३॥
सुनि कै बोले क्रिपा निधाना
अुज़तम जंबू दीप महाना
लख जोजन इस को बिसतारू३
सभि दीपन के लखहु मझारू ॥४॥


१जग़ीरे, धरती दे इलाके पौराणक वंड मूजब
२जाण वाले
३फैलाअु

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