Sri Nanak Prakash

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१८९३

४२. चरन धान प्रताप, बज़चे दा प्रसंग मूला, कीड़ प्रिज़था, खेडा प्रिथी
मल, सहगल, रामा, डिडी प्रति अुपदेश॥
४१ੴੴ पिछला अधिआइ ततकरा अुतरारध - ततकरा पूरबारध अगला अधिआइ ੴੴ४३
{छोटे बज़चे दा प्रसंग, तारू पोपट} ॥९-२२॥
{मूला कीड़} ॥२३..॥
{मूले ने चोर दा पड़दा ढकिआ} ॥३४..॥
{मूला कीड़ ळ गुरू जी दा वर} ॥४६॥
{प्रिथा, खेडा} ॥४९..॥
{गुरू जी दे चरन संगत} ॥५४..॥
{प्रिथीमल, रामा, डिडी} ॥५९..॥
{तिंन किसम दा तप} ॥६१..॥
दोहरा: श्री गुरपद अरबिंद को, धान चढावोण भंग
तजहुण सिआनप सरब को, रपहुण एक प्रभु रंग ॥१॥
रपहुण=रंगिआ जावाण, रंग विच रंगिआ जाणा तोण मुराद है प्रेम विच मगन
हो जाण (अ) चढावोण तजहुण ते रपहुण दे अुज़ते जे बिंदी ना होवे तां सारे दोहे दा
अरथ मज़धम पुरख विच हो जाएगा, अरथात तुसीण चड़्हावो, तुसीण तजो, तुसीण रंगे
जावो
अरथ: श्री गुरू जी दे चरन कमलां दे धिआन दी भंग (आपणे मन ळ) चड़्हा के
सारीआण सिआणपां दा तिआग कर दिआण ते इक प्रभू दे रंग विच रंगिआ
जावाण
श्री बाला संधुरु वाच ॥
चौपई: श्री अंगद जी! सुनहु कहानी
रहे ग्राम निज श्री गुनखानी
बीतति भयो कितिक तहिण काला
महिमा जहिण तहिण बढी बिसाला ॥२॥
दरशन करन हेत नर आवहिण
धरैण कामना फल को पावहिण
मनहु प्रकाशी कीरति जौन्हा१
पसरी भली चौद हूं भौना२ ॥३॥
संत चकोर रिदे हरखाए३
दंभ दुहागनि४ को दुखदाए


१जस रूपी चांदनी
२चौदां ही भवनां विच (सारे
३अनद होए
४दंभी रूप दुहागणां

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