Sri Nanak Prakash

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५९. श्री गुरू ग्रंथ मंगल मदीना, सुलतानपुर जाणा॥{मुहंमद साहिब दी गोर ने गुरू जी अज़गे झुकंा} ॥१३..॥
{गुरू जी दी खड़ांव दी पूजा} ॥१८.. ॥मदीने
{गुरू जी दी खड़ांव दी पूजा} ॥३५.. ॥मज़के
{गुरू जी मज़के तोण सुलतानपुर} ॥३९..॥
{मरदाने नाल खुशी दे वचन} ॥५८..॥
दोहरा: जिस महिण अंम्रितु गान है, मांिक भगति विराग
गुरू* ग्रंथ साहिब अुदधि, बंदोण करि अनुराग ॥१॥
मांिक=रतन
अुदधि=समुंदर, सागर संस: अुदधि॥
अनुराग=प्रेम
अरथ: (श्री) गुरू ग्रंथ साहिब (रूपी) समुंदर (ळ, कि) जिस विज़च गान (रूपी)
अंम्रत है (अते) भगती (ते) वैराग (रूपी) रतन (हन, मैण) प्रेम नाल
नमसकार करदा हां
श्री बाला संधुरु वाच ॥
दोहरा: श्री अंगद जी सुनहु पुन, केतिक दिवस बिताइ
मरदाने को बच कहे, अस बिधि श्री गतिदाइ ॥२॥
सैया: चलिबे जित चाहि चलो तित को
सुनि बोलति भा गुरु सोण मरदाना
जिह थान मैण गोर मुहंमद है
दिखरावहु मोहि को सोअू मकाना
इह काबे को पाज तौ देखि लयो
अब तांहि बिलोकन चाहि महाना
इस देश अएअब देखि चलेण
तुम कामना पूरन हो गुनखाना१! ॥३॥
सैया: गुर बैन भने दिन दादश गैल२ है
गोर मुहंमद जुअू मकाना
सुनि यौण हरखाइ अुठा मन मैण
गुर संग तबै इव बैन बखाना
चलि तूरन जाइ पहूच हैण तांहि

*पा-श्री
१हे गुणां दी खां जी!
२रसता
लग पज़ग २४० मील दा पैणडा है

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