Sri Nanak Prakash

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३८. गुरू नानक मंगल भा: लालो मिलाप॥

{भाई लालो मिलाप} ॥७..॥
{नौण प्रकार दी भगती} ॥१८.॥
स्री बाला संधुरु वाच ॥
तोटक छंद: गुरु नानक धान सदा करियै॥
भव बंधन मैण पुनि ना परियै
सुख सागर रूप अुजागर जो
सभि जीतन दंभहि आगर जो ॥१॥
दुख दारिद दोख निकंदन है
अरबिंद दुतं पद बंदन है
सुख कंद मुकंद गयानघन
शरनागति के अघ ओघ हन ॥२॥
भव मैण भव कारन जाणहि धरा
अब चाहिति तांहि सपूर करा
मतिमंद निरे नर भूर भरो
पिख कै हरि कीरति सेत करो ॥३॥
तिह अूपर पार परे नर सो
पद पंकज सेवति जो अुर सोण
गुरु रूप बिखै नित धान धरैण
निरसंस भए जम ते न डरैण ॥४॥
अुजागर=प्रसिज़ध प्रगटआगर=स्रेशट (अ) समूह, सारे, खां, खजाना संस: आकर॥
दुतं=शोभा मुकंद=मुकती दे दाता
ओघ=समूह घन=बज़दल गाड़्हा, निरंतर
भवमै=संसार विच भव धरा=अवतार लीता
निरे=नरक संस: निर=नरक॥ (अ) केवल तुक दा दूसरा अरथ इअुण
है:- (संसार विच) खोटी मत वाले बहुते लोक ही निरे भरे पए हन
भूर=बहुते सेत=पुल
अरथ: (अुस स्री) गुरू नानक (जी दा) धान सदा करीए जो प्रसिज़ध सुज़खां दा समुंदर
हन, (अते) जो सारे पखंडां दे जिज़त लैंे विच (सभ तोण) स्रेशट हन (तां जो)
संसार दे बंधनां विच ना फसीए दुज़ख दलिद्र ते दोशां ळ दूर करन वाले
हन, अुन्हां दे कवलां दी शोभा वाले चरनां पर (मेरी) नमसकार है, जो सुख
दा मूल ते मुकती दे दाता, गान दे बज़दल ते शरन आइआण दे सारे पाप

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