Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ४) १३

रितु चअुथी चज़ली
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
श्री वाहिगुरू जी की फते॥
अरथां लई देखो रासि ३ दा आदि।
अथ चतुरथ रुत कथन ॥
१. ।मंगल। खालसे दा बाहर चड़्हना॥
ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ४ अगला अंसू>>२
१. इश देव-श्री अकाल पुरख-मंगल।
दोहरा: दीननि दालु* अनदघन, जो सभि मैण लय, लीनि।
लीनि नाम जन जाणहिने, तिन कौ कैवल दीनि ॥१॥
अनदघनु = इक रस आनद (सरूप)। लय = समाइआ होइआ।
लीन = जज़फी विच, नाल लगे होए, अलब विच, आसरे।
कैवल = कैवल = सदा दी मुकती।
सूचना-जो सभ मैण लय ते लीन दुहां दी देहुरी दीपक है।
अरथ: दीनां अुज़ते दिआलू के इक रस आनद (सरूप परमातमा) जो सारिआण विच
समाइआ होइआ है (अते) जिस दे आसरे सारे (काइम) हन, (ऐसे
परमातमा दा) नाम जिन्हां जनां ने लीता है, अुहनां ळ (आप ने) कैवल
(पदवी) दिती है।
भाव: नाय ने दुज़ख तोण ( = २१ प्रकार दे दुज़ख तोण) मूलोण ही छुटकारा पा जाण दा
नाम केवल दज़सिआ है, साधन अुस दा है १६ पदारथां दा ततगान। सांख
विच त्रै प्रकार दे दुखां तोण संपूरण खलासी ळ कैवल आखिआ है, ते विवेक
अुस दा साधन है। योग दरशन विच अहंकार ही पूरन नविरती हो जाण ते
द्रिशटा दा सै सरूप विच इसथित हो जाणा कैवल है, चित ब्रितीआण ळ
निरोध करना अुस दा साधन है।
वेदांत विच अदैत विच निशचा होके निरोल ब्रहम भाव विच हो जाणा कैवल है,
साधन अविज़दा दा नाशकरना है। गुरमत मारग विच जदोण कैवल पद
वरतिआ जावे तां भाव है:-जीवातमां दा प्रमातमां नाल अविछड़ मेल विच
(सदा संजोग विच) हो जाणा, भाव जीव तज़त दा परम तज़त नाल अविछड़
मिलाप। इस दा साधन प्रेम है, परेम दा विदत सरूप सिमरन है।
२. इश गुरू-दसो गुरू साहिबाण दा-मंगल।
कबिज़त: हरि हरि खोटी मति हरि हरि दै दै नाम
गुर गुरू नानक जहाजनि को भरि भरि।
करि करि पार गुर अंगद अमरदास


*पा:-दीन दइआल।

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