Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (ऐन १) ११९

करहु अकाल पुरख को बंदन।
बंदन होवैण बंधु निकंदन१।
इम कहि क्रिपा द्रिशटि प्रभु हेरी।
रिदै प्रकाश भयो तिस बेरी ॥४१॥
बारि बारि बारज पद२ बंदति।
लखि गुर महिमा रिदे अनदति।
बहुर साध कहि शरधा सेती।
एतिक बैस रु सोझी एती? ॥४२॥
सुनि करि श्री सतिगुरू बखाना।
तुमहु गोदड़ा रखो पुराना।
३पोशिश नई* जिनहु कर पावै।
ले सो पहिरहि अंग सुहावैण६ ॥४३॥
बंदन करति साध थिर भयो।
तबि सिंघनि गन बूझनि कयो।
तुमरी बय महि समे घनेरे।
कहो प्रसंग जथा के हेरे ॥४४॥
इक ब्रितंत तबि साध सुनायो।
सुनहु समा जैसे दरसायो।
बासुर एक समाधि अुघारी।
नहीण बिलोकति भा नरनारी ॥४५॥
इक दुइ मजल गयो मैण जबिहूं।
को इक मनुज निहारो तबि हूं।
तिन सोण बूझनि कीनि ब्रितंत।
-कहां भयो नरु नहीण दिखंति? - ॥४६॥
-भा दुरभिज़छ गए मरि घने।
को को रहे किसू थल बने।
दादश संमत परो बिसाल।


१नमसकार नाल (जनम मरन) दे बंधन नाश होणगे। (अ) बंन्हण वाले बंधन निकंद होणगे। (ॲ)
बंधन टुज़ट जाणगे (ते फिर) बंद (कैद) नहीण होवेगी।
२चरन कवल।
३जिन्हां दे नवीण पुशाक हज़थ पए ओह लैके पहिरदे हन (अंग=) शरीर शोभदे हन। भाव तूं पुराणी
देह सांभी होई है। जिन्हां ळ नवेण सुहणे सरीर मिलन ओह पुराणिआण ळ की करन।
*पा:-नहीण।

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