Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १०) १२५

१७. ।ब्राहमण दा पुज़त्र जिवाइआ॥
१६ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १० अगला अंसू>>१८
दोहरा: दिज जननी रोदति अधिक, इकठे नर समुदाइ।
शोक बिलोकति रोकते, रौर न रुदन अुठाइ ॥१॥
चौपई: केतिक नर सतिगुर ढिग आए।
हेतु रौर को सकल सुनाए।
म्रितक पुज़त्र को बिज़प्र अुठाइ।पौर आप के दीनसि पाइ ॥२॥
रहे हटाइ हटति किम नांही।
कहै -कि सुध दिहु सतिगुर पाही।
मेरो पुज़त्र जिवावनि करैण।
नातुर हम दोनहु भी मरैण- ॥३॥
समुझति नहीण, रहे समुझाइ।
सुनि बोले श्री गुर हरिराइ।
करहु बिज़प्र सोण -करहु अुठावनि।
परालबध प्रानी भुगतावनि ॥४॥
पूरब जनम करम जिम करिही।
जग महि जीव सरीरनि धरिही।
दुख सुख जितिक भोगिबो होइ।
अुज़तम आदि जनम जो कोइ ॥५॥
जितिक समेण लगि सासनि धरता।
त्रै को१ अहै बिधाता करता।
जनम होनि ते पूरब काला।
तीनहु रचे जीव के नाला ॥६॥
ईशुर की इह करी म्रिजाद।
को न हटाइ सकहि सुर आदि-।
सुनति मसंद हाथ जुग जेरि।
पाइ रग़ाइ गयो दिज ओर ॥७॥
कही गुरू की सकल सुनाई।
बिज़प्र! जाहु ले म्रितक अुठाई।
इह किम होइ मरो पुन जीवै।


१तिंनां (१. अूच नीच जाती विच जनम। २. दुख सुख। ३. अुमरा) दा।

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