Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (ऐन २) १२४

मिली सपतनी आपस मांही।
सिमरति पति सुत रुदन कराहीण ॥३१॥
दैव करी गति कहां हमारी।
अंत समैण गुर ब्रिहु महि डारी।
अति कठोर धिक रिदे हमारे।
सुति पति बिछरे, भे तन धारे१ ॥३२॥
मिली परसपर दोनहु रोई।
त्रिय सिज़खनि की गति तस* होई२।
बिनै समेत प्रबोधति घनी।
गुर पतनी तुम नहि इम बनी ॥३३॥
सेवा करहि सरब हम दासी।
निस बासुर परचहि रहि पासी।
इज़तादिक बहु भाखनि करो।
मात सुंदरी धीरज धरो ॥३४॥
मंजी पर बिछावनो छाए।
सो आयुध करि नमो टिकाए।
दोनो सौत प्रभाति शनानैण।
गुर सरूप करि तिन कौ मानैण ॥३५॥
पुशप धूप चंदन चरचावैण।
दरशन करि भोजन को खावैण।
सिख संगति कित ते चलि आवै।
गुर समान अविलोक मनावै ॥३६॥
अरपति गन अुपहारअछेरे।
नित प्रति पूजा होति बडेरे।
महिमां शसत्रनि की बहु भई।
धरी कामना सो सिख लई ॥३७॥
साहिब देवी सदा सचिंत।
सौत सुंदरी निकट बसंति।
गुर शरीर को चितवन करती।


१पती ते पुज़त्राण तोण विछड़िआण होइआण वी असां (अजे) तन धारिआ होइआ है।
*पा:-गन तहि।
२सिज़खां दीआण इसत्रीआण दी बी तिवेण गत होई, भाव सारीआण रों लगीआण।

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