Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) २२५

२१. ।खडूर दे तपे दा प्रसंग॥२०ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १ अगला अंसू>>२२
दोहरा: इस प्रकार केतिक दिवस, बीत गए तिसु थान।
प्रगटहिण जग महिण नहिण अधिक श्री अंगद गुन खान ॥१॥
चौपई: इक खडूर महिण तपा रहित है।
अपनी सतुति जु सदा कहति है।
जंत्र मंत्र करिबे जिस आवै।
लोकन बिखै पखंड कमावै ॥२॥
बहुते नर जिस मानहिण आन१।
चरन धरहिण सिर, नमो बखानि।
जिस को कहो करहि सभि कोइ।
बहुत भांति तिस पूजा होइ ॥३॥
खहिरे२ जाट खडूर मझार।
बसति हुते सहि बड परवार।
सरब तपे की आइसु मानहिण।
अनिक अुपाइन देवन ठानहि ॥४॥
दुगध, दधी घ्रित अर मिशटाना*।
परबन बिखै लाइण धनधाना३।
तिह ढिग अरपहिण, बिनै बखानहिण।
इज़तादिक प्रिय वसतू आनहि ॥५॥
तिस ते डरहिण ग्राम नर सारे।
-नहिण४ रिस धारि कुबाक अुचारे-।
कहै सु मानहिण नर ग्रामीन।
जो संतन को सकहिण न चीन५ ॥६॥
प्रिय६ तिस कौ निस बासुर करिहीण७।


१ईन, मिरयादा, आगा।२जज़टां दा इक गोत।
*पा:-पट नाना।
३परबाण दे दिनां पर (जैसे मज़सिआ संगराणद आदि) माल दौलत लिआअुणदे सन। ।धन = दौलत।
धान = चावल आदि अंन॥।
४मतां।
५नहीण पछां सकदे (पिंड दे लोकीण)।
६पिआर।
७भाव ग्रामीन लोक।

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