Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) २४५

गुर को जाइ बंदना कीनसि।
पिशटि फेरि बैठे चित चीनसि।
-अग़मत करी दिखावनि- जानी।
नहिण नीकी स्री अंगद मानी ॥४६॥
सिज़छा अजर जरन की देनि।
सिख अुर समता निज करि लेनि१।
प्रिशटि दए२ बैठे गुर सामी।
सरब बारता अंतरजामी ॥४७॥
पिखि स्री अमर दुतिय दिश गइअू।
नम्रि बंदि कर इसथित भइअू।
लजा करै सुनेत्र निवाए।
चित महिण दुचिताई३ अुपजाए ॥४८॥
त्रिती दिशा पुन आनन फेरो।
अपनि दास को नांहनि हेरो।
-शकति जनावनकिय अपराधू।
नहीण करम कीनसि इहु साधू- ॥४९॥
भए दीन मन मोहिन तात४।
पुन सनमुख होयो पछुतात।
कहिन बाक को अुदिति५ भयो जबि।
चतुरथ दिश६ मुख फेर लियो तबि ॥५०॥
होइ अुताइल मुख दिश फेर७।
निज अपराध सु बूझो हेरि।
भो प्रभु गुर! अबि छिमां करीजै।
शुभि अुपदेश मोहि कअु दीजै ॥५१॥
भूले को तुम बखशन हारि।


१सिज़ख दे दिल विच आपणी समता देण लई भाव आपणे वरगा करन लई। (अ) आपणे सिज़ख दे
दिल विच समता भाव (द्रिड़्ह) कराअुण लई।
२पिज़ठ मोड़के।
३चिंता!
४स्री अमर दास जी।
५तिआर।
६चौथी तरफ।
७काहली नाल मुखड़े वाले पासे ळ फिरे।

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