Sri Gur Pratap Suraj Granth

Displaying Page 270 of 448 from Volume 15

स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ३) २८२

२९. ।चज़ये मज़ये मसंद ळ दंड। मसंदां दी नकल॥
२८ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ३ अगला अंसू>>३०
दोहरा: सतराण सै पचवंजवेण, श्री देवी बिदताइ।
सतिवंजेण महि सतिगुरू, गहे मसंद झुठाइ१ ॥१॥
चौपई: पूरब दिश मैण नगर बिसाले।
काणशी पटना सिज़ख बंगाले।
गाग़ी पुरि, ढाका, मुंगेर।
राजमहिल, मिरग़ापुर हेरि ॥२॥
फरकाबाद, मखसूदाबादि।
ब्रहम पुज़त्र बड नद ते आदि।
कहि लगि गिनीऐ पूरब दिशि के।
देति कार गुर पाइ२ परस के ॥३॥
दै मसंद अुत ते धन लावैण।
अधिक अरध ते आप छपावैण।
कुछ अरपहि सतिगुरू खग़ाने।
बहु धन ते जिन गरब महाने ॥४॥
हीरे मुकता आदि जवाहर।
आनहि राखहि पास अग़ाहर३।
बसत्र बिभूखन मोल बडेरे।
सिखन ते ले राखति डेरे ॥५॥
पूजा दरब खाइ बयसारी।
शरधा छोरि गई मतिमारी।
-४हमसकेल गुर को धन दैहैण।
नतु घर बैठे कित ते पैहैण- ॥६॥
इज़तादिक मन जानति गरबैण।
लाखहु निज घर राखहि दरबै।
सिज़ख बंगाले ते इक आयो।
थान बादला को५ इक लायो ॥७॥


१झूठे मसंद।
२चरन।
३लुकाके।
४(मिसंद इअुण विचारदे हन:-)
५इक पट दा कज़पड़ा जो तिज़लेताराण पाके अुणीणदा है।

Displaying Page 270 of 448 from Volume 15