Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) २९३

प्रेम संग सिमरन करहिण, मुख धंन अुचारहिण।
पुलकावल गदि गदि गिरा, अुपकार बिचारहिण१ ॥६॥
लीन होइ मन गुर चरनि, अस अंम्रित वेला।
अंम्रित बरखति गुरु निकट, सुनि होति सुहेला२।
जिन के शुभ बडिभाग हैण, पहुंचहिण तिस काला।
जिम समुंद की झाल३ ते, लहि रतन सुखाला ॥७॥
इस प्रकार गुर निकट ते, सद गुन४ को पावैण।
जनम मरन चिरकाल के, इन मूल मिटावैण।
परम प्रेम अुमगहि रिदै, सिमरहिण सतिनामू।
मिज़था लखि परपंच को, इक थल बिसरामू५ ॥८॥
दिवस चड़्हे इस रीति सोण हुइ अनणद बिलासा।
तब संगति सगरी मिलहि, हुइ परम प्रकाशा।
दरशन लहै पुनीत६ बहु, जन शांति सरूपा।परम ब्रिज़ध, कद लघु७ जिनहुण, गुर त्रिती अनूपा ॥९॥
हलत पलत करते सफल, दरशन को पाए।
बंदन करि बैठहिण निकट, मन मोद अुपाए।
परमेशुर की दिश रिदा, अभिलाखति जोई।
सु प्रसंन तिस पर अधिक, प्रभु प्रापति होई ॥१०॥
सुमग बताइ निहाल करि, ततकाल अनदे।
सिमरन की लिव अुर लगहि, तिन अहं निकंदे।
जो अरथीय पदारथन८, दरशन को आवैण।
जानि बिरद९ निज देति हैण, खरचति ही भावै ॥११॥

अंगद देव जी दी वडिआई करदे हन (कि किवेण अुन्हां ने) लोकाण ळ बखशशां ते सुख दे के निहाल
कीता।
१(इह सुणके श्रोते) प्रेम नाल (गुराण ळ) याद करदे ते मूंहोण धंन धंन कहिणदे हन, (ऐनां प्रेम है
कि) पुलकावली आ जाणदी ते बाणी गद गद हो जाणदी है अुपकार याद करदिआण। पुलकावली = प्रेम
विखे रोम खड़े होणे।
२होईदा है सुखी।
३छज़ल।
४चंगे गुण।
५इक टिकाणे (भाव सरूप विच) टिकदे हन।
६पविज़त्र।
७मधरा।
८पदारथां दे लोड़वंद।
९धरम।

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