Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ३४३

३६. ।बाबा बुज़ढा जी समेत संगति दा संन्ह साहिब जाणा,
गुरू जी दा प्रगट होणा॥
३५ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १ अगला अंसू>>३७
दोहरा: सुनी तुरंगनि बारता,
बुज़ढे बहु सुख पाइ।
इह असवारी गुरू की,
अग़मत जुति दरसाइ ॥१॥
चौपई: गुर बिन नहीण अरूढनि देति।
यां ते सो तजिगयो निकेति।
अबि इस को कीजहि शिंगार।
प्रथम शनानहु सुंदर बारि१ ॥२॥
धूप दीप चंदन चरचावहु२।
फूल बिसाल माल पहिरावहु।
पाइ बसतनी३ सुंदर ग़ीन४।
कविका५ देहु मुहार६ नवीन ॥३॥
संगति करहि बेनती सारी।
छोरि देहु इहु चलहि अगारी।
संग संगतां गमनहिण पाछे।
गुरु को खोज लेहि इहु आछे ॥४॥
ब्रिध को बाक मानि सभि लीना।
सभि शिंगार शिंगारनि कीना।
दई छोरि पुरि वहिर तुरंगनि।
बहु सुंदर जो सगरे अंगनि ॥५॥
सने सने चलि सहज सुभाइ।
पीछे सगरी संगति जाइ।
बुज़ढे आदिक सिख समुदाए।
अवलोकति बड़वा बिसमाए ॥६॥


१जल नाल।
२धूप दीप (जगा के) चंदन छिड़के।
३काठी दे अुपरला कपड़ा।
४काठी।
५लगाम।
६वागां।

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