Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ३९२

गोइंदवाल सिवर कोघाला१।
बिज़प्र बीरबल चमूं बिसाला।
पुरि मैण प्रविशे नर मति हीन।
घर खज़त्रीन खोज करि लीन ॥३५॥
आइ दिवान बीरबल बैठा।
मिलहु सकल दे करि तुम भेटा।
सुनि करि गुर सनबंधी घने।
अपर मिले कुछ गुर ढिग भने ॥३६॥
आगा देहु जथा हम करैण।
नांहि त बिज़प्र दैख को धरै।
श्री गुर अमर भनो जुग२ जावहु।
हमरी दिश ते३ भाखि सुनावहु ॥३७॥
-इह गुर पुरि जानहु अुर मांही।
कार विहार करति को नांही४।
जो परमेशुर देति पठाइ।
सो अचि, औरन देण अचवाइ+ ॥३८॥
भोजन लेहु देग ते जेता।
तुमरे निकट पठहिण हम तेता।
नहीण रजतपण लेति न देति।
इही रीति है गुरू निकेत५- ॥३९॥
तिस के नरन संग सिख गए।
बैठो बिज़प्र अहंक्रित कए६।
खरे होइ करि बात सुनाई।
श्री नानक गादी इस थाईण ॥४०॥
त्रिती थान गुरु अमर सुहाए।
सिख संगति अुपदेश द्रिड़ाए।


१डेरा पाइआ।
२दो (पुरश)।३असाडे वलोण।
४कोई कार विहार (गुरू जी) नहीण करदे।
+पा:-देत अचाइ।
५गुरू घर दी।
६हंकार करे।

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