Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ३) ४०५

४५. ।पंमा वग़ीर दत होके रिहा। कड़ाह प्रशाद चरचा॥
४४ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ३ अगला अंसू>>४६
दोहरा: *परबत पतहि१ वग़ीर इक, नाम सु परमानद।
प्रेम जनावति न्रिप पठो, सुधि बुधि बिखे बिलद ॥१॥
चौपई: अनिक मतन को शुभ मति बेता२।सुनि३ इतिहास पुराननि जेता।
मिलो आनि कलीधर साथ।
धरी अकोर जोरि जुग हाथ ॥२॥
परम प्रेम करि परमानद।
लहो दरसु ते परमानद४।
श्री सतिगुर सतिकारि बिठारा।
सैलपतनि कौ कुशल अुचारा ॥३॥
किस कारज ते न्रिपत पठायहु।
कहहु काज जिस हित चलि आयहु।
सुनि कर जोरति बाक बखाना।
तुम दरशन कौ लाभ महाना ॥४॥
पठो मोहि रावर की सेवा।
-रहीऐ निकट जाइ गुरदेवा-।
न्रिप दिशि ते बसहौण मैण तीर।
परहि बिगार नहीण किम धीर ॥५॥
लिखौण मिग़ाज५ आप कौ सारा।
कारज परहि सु देहु सुधारा।
इज़तादिक नित की सुध राखनि।
पठो दूत करि इम अभिलाखनि६ ॥६॥
इत रावर को दरशन लेहू।
अधिक लाभ फल मो कहु एहू।


*सौ सा: दी दूसरी साखी।
१पहाड़ी राजिआण दा।
२अनेक मतां ळ सुहणी बुज़धी नाल जानं वाला सी।
३सुणिआण होइआ सी (अुस ने)।
४परम आनद।
५भाव, सुख सांद।
६चाह करके।

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