Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ४१४करि बंदन को चले अदोशा१।
लवपुरि अपने ग्रहि महिण गए।
अुठे प्रात तहिण जावति भए ॥१३॥
सुनि अकबर ने सरब हकारे।
दिज खज़त्री पहुणचे तबि सारे।
अपर लोक अरु सभि अुमराव।
मिलि इकठे होए तिस थांव ॥१४॥
सभिनि संग अकबर ने कहो।
कौन खोट इन महुण तुम लहो?
जिस पर करि पुकार सभि आए।
अपनो धरम कहहु समुझाए ॥१५॥
दिज खज़त्री पंडित बिच केई।
मतसर अगनि जरति हैण जेई।
सो बोले इन खज़त्री जाति।
अपनो पंथ करो* बज़खात ॥१६॥
बेद रीत को तागन करो।
औरे मत अपनो परचुरो२।
अपर बात तो कहिनी कहां।
हिंदुनि धरम गाइज़त्री महां ॥१७॥
सो भी नहिण जानहिण नहिण जपैण।
गुरबाणी कुछ औरहि थपैण३।
तबि अकबर ने इन दिश देखा।
गाइत्री तुम धरम विशेखा ॥१८॥
सो भी पठी न तुम ने कैसे।
हिंदु धरम खज़त्री किमि हैसे?
रामदास गुर बचन संभारा।
भुजा दाहिनी दिशा निहारा ॥१९॥
सभि बिज़दा प्रापत भी ऐसे।१भाव श्री (गुरू) रामदास जी।
*पा:-करहि।
२प्रचारिआ है, जारी कीता है।
३बखांी है।

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