Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १०) ५६

७. ।मर्हाज के ते कौड़े राहक॥
६ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १० अगला अंसू>>८
दोहरा: भईप्रभाति मर्हाज के, मिले परसपर ब्रिंद।
नहि मानी कौरानि सभि, श्री गुर गिरा बिलद ॥१॥
चौपई: दरशन परम पावनो करि कै।
पद अरबिंद सीस कहु धरि कै।
बैठे निकटि सकल कर बंदि।
क्रिपा द्रिशटि सोण पिखति मुकंद ॥२॥
अविनि लेनि को सकल प्रसंग।
कहो भयो जिम कौरनि संग।
सुनि कै दीन होइ करि भनै।
रावर ते सभि कारज बनै ॥३॥
अगम१ होइ बहु सुगम करंते।
जिनहि सुगम तिह अगम रचंते।
नहीण आसरा दूसर कोई।
तुमरे चरन पराइन२ होई ॥४॥
होइ अुपाइ सु देहु बताई।
जथा बास हम ते बनिआई३।
बिना बास ते नहि बिसराम।
लाज बडाई नहि बिन धाम ॥५॥
श्री हरिराइ गुरू सुनि कान।
बिनती सिज़खनि कीनि महान।
भए दीन से चहति धरनी।
तिन के हित की बानी बरनी ॥६॥
करहु कूच तुम अपनो डेरा।
ले करि सरब साथ इक बेरा।
चलित जहां संधा पर जाइ।
तहि डेरे को लेहु टिकाइ ॥७॥
रचहु सदन सभि ग्राम बसावहु।१कठन।
२आसरे।
३जिवेण साडा (किते) वासा हो जावे।

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