Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ४५३

४८. ।जमना दी आदि कथा॥
४७ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १ अगला अंसू>>४९
दोहरा: तीन दिवस श्री अमर जी, कुरुछेतर महिण बास।
पुन आगे गमने सुमग, सिमरति स्री अबिनाश१ ॥१॥
चौपई: सनै सनै सहि+ संगति चले।
सभिहिनि की सुधि लेवति भले।
होहि श्रमत२ तिस देहिण सहारा।
कहि नहिण++ संकट किसू प्रकारा ॥२॥
सभिहिनि को अरोग करि चलि हैण।
जै जै कार होति सुनि भलि है।
जहिण कहिण जसु पसरहि सतिगुर को।
मिलहिण बहुति नर प्रेम सु अुर को ॥३॥
पहुणचति भे कालिद्रीकूल३।
सुंदर शामल जल अनुकूल४।
संगति भीर संग गुर भारी।
अुतरे सुंदर छाय निहारी ॥४॥
पावन जल महिण सकल शनाने।
जथा शकति दीनसि तहिण दाने।
खान पान करि कै बिसरामे।
अुठति सकल सिमरति हरि नामे ॥५॥
सभि संगति चित चाअु घनेरा।
सतिगुर बाक सुनहिण सभि बेरा५।
हाथ जोरि करि सभिनि, अगारी६।
बूझनि के हित गिरा अुचारी ॥६॥
प्रभु जी! जमना केर प्रसंग।
करहु सुनावनि संगति संग।

१वाहिगुरू ळ।
+पा:-महि।
२जो थक जावे अुस ळ।
++पा:-को।
३जमना दे कंढे।
४सुहावंा।
५हर वेले।
६सभ ने (गुरू जी) अज़गे।

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