Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ५०२

तिलक गुरमुखी मसतक लाइ ॥३६॥
सेली१ दई करहु सिख संगति।
सज़तनाम जपीऐ मिलि पंगति।
संगा२ भगतनि की तुम होई।
जग संताप बिनासो जोई३ ॥३७॥
तुम अबि अपने ग्रिह कअु जावहु।
सज़त नामको जाप जपावहु।
गुरमुख मारग करहु प्रकाश।
जहिण कहिण होवहि भगति निवास ॥३८॥
सुनि मुद४ माईदास बिसाल।
मांक के पाइन५ ततकाल।
नमसकाल करि होयहु संगि।
दोनहु प्रापत अनणद अभंग६ ॥३९॥
भुगति मुकति प्रापति कर मांही।
गुर के कुछ अचरज इहु नांही।
गुर चेला दोनहु तबि होइ।
पद७ श्री अमर परत भे सोइ ॥४०॥
करि बहु प्रेम बिनै बहु ठानी।
हे सतिगुर अपदा सभि हानी।
दोनहु गमन कीनि ततकाले।
सदन आपने बसे सुखाले ॥४१॥
सज़तानाम बहु नर अुपदेशा।
सिज़खी को विसतार विशेा८।
बचन कहो ततछिन फुर जावै।
लोक अनेक पूजिबे आवैण ॥४२॥


१काली अुणन या रेशम आदि दी बणी गले पाअुण या सिर लपेटन दी शै।
२नाम।
३संसार दे दुख नाश होए।
४प्रसंन होइआ।
५चरनीण।
६इक रस आनद।
७चरनीण।
८भाव प्रचार बहुत कीता।

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