Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (ऐन १) ६४

चित परलोक पयाना चहौण ॥२२॥
इम बोलति ही तागे प्राना।
पाई गति भा धंन दिवाना।
बाहर तबि अुठाइ ले आए।
नर जंगल के सुनि बिसमाए ॥२३॥
केतिक निदहि मति हति होए१।
इह का कीनि करम दुर२ जोए।
हतो दिवाना, गुर भल भयो३।
करहि न क्रित को४ जिम अबि कयो ॥२४॥
केतिक कहैण दिवाना अरो।
लरो सिंघ सोण, मारन करो।
केचित कहैण गुरू के देअू।
सिंघ दिवाना लरि मरि सोअू५* ॥२५॥
*करो कूच तबि स्री प्रभु डेरा।
गमने होइ चौणतरे नेरा।
तिस के ढिग ढिग हुइ चलि गए।
जैतो+ आनि अुतरते भए ॥२६॥
करो मुकाम ताल इक हेरे।
तिस की महिमा कही बडेरे।
निसा भई करि खान रु पान।
सुपति जथा सुख गुर भगवान ॥२७॥
भई प्रभाति कूच करिडेरा।
गमने कितिक कोस थल हेरा।


१जिन्हां दी बुज़धी नाश होई होई सी।
२खोटा।
३इह चंगा गुरू होइआ।
४कोई बी (सिज़ख) ऐहो जेही कार नहीण करदा।
५सिंघ ते दिवाना जो लड़िआ ते मरिआ है दोवेण ही गुरू के हन।
*पहिरे ते खड़े दा जद कोई किहा ना मंने तां इस वेले बी सारी सभ दुनीआण पहिरे वाले ळ
निरदोश कहेगी, जद कि ओह पहिलोण रुकिआ नहीण ते फेर मूसल मारन लई दिवाने ने अुठाइआ
जिस तोण पहिरेदार ने अुसळ ग़रूर दोशी समझंा है। सिंघ दी डिअूटी (फरग़) ते सै रज़खा दुइ
गज़लां अुसदे पज़ख दीआण हन।
*इह प्रसंग साखीआण वाली पोथी दा है।
+रिआसत नाभे विच है।

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