Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ५६५

६१. ।खेडा सोइनी ब्रहमण प्रसंग। गोणदे दे पुज़त्राण ळ कीती दा फल॥
६०ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १ अगला अंसू>>६२
दोहरा: दिजबर खेडा सोइरी*, दुरगा भगति बिसाल।नित प्रति पूजा बहु करे, धरे गान सभि काल ॥१॥
चौपई: नर समुदाइ मिलहिण ढिग आवैण।
श्री दुरगा के दरशन जावैण।
संमत महिण जुग जात्रा करिही।
निरजल निराहार ब्रत धरिही१ ॥२॥
इक बारी जात्रा को चलो।
तिस के संग ब्रिंद नर मिलो।
चलति पंथ महिण गुर पुरि२ आवा।
दरशन करिबे को ललचावा ॥३॥
भयो ठांढि जबि गुर के दारे।
तबि सिज़खन इमि बाक अुचारे।
गुर आगा को सुनिबो करीअहि।
बहुर निकेत पौर महिण बरीअहि ॥४॥
-प्रथम देग ते अचवहु जाइ।
पीछे गुर दरशन को पाइ-।
सुनि करि खेडे कीनि बिचारनि।
-मैण किमि करिहौण नेम निवारनि ॥५॥
सुच करि करोण अहार हमेशू।
गुर की देग प्रवेश अशेशू३।
आश्रम, बरन, नेम बिवहार।
गुर को मिलहिण सकल निरवारि४ ॥६॥
ऐसा को बड प्रेमी होइ।
गुर हित रखहि अपर सभि खोइ५।
दुरलभ बरन सु आश्रम धरम।


*भा: गुरदास जी ने सोइनी लिखा है।
१बिनां जल तेबिनां खांे तोण वरत रखदा सी।
२भाव श्री गोइंदवाल।
३लगर विच आवाजाई सभ दी है।
४गुरू जी ळ सारे (नेम) छज़डके (लोकीण) मिलदे हन।
५गुरू विच ही प्रेम रखे (ते) होर सभ कुछ गुआ लवे।

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