Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ६) १३६

१७. ।बाघन ते बिज़जघोख दे गोले चलाअुणे॥
१६ॴॴपिछला अंसूततकरा रुति ६ अगला अंसू>>१८
दोहरा: शेर सिंघ जोधा महां, नाहर सिंघ ते आदि।
सभिनि सिंघ मनु कामना, दई करे अहिलाद१ ॥१॥
ललितपद छंद: देवनि को भी दुरलभ दीरघ
चार पदारथ दीने।
अंत समैण दै अपन समीपा२
महां क्रितारथ कीने ॥२॥
थान थान प्रति मुरचनि मांही
करे सिंघ सवधाना।
होनि समीप न दीजै दुरजन
शसत्रन ते करि हाना ॥३॥
बिनां त्रास इक गुर की आसा
सिंघ सुचेत रहंते।
दुटश समीपी होनि न पावैण
लाखहु गिरद भ्रमंते ॥४॥
अुत सूबे दोनहु मिलि बैठे
भीमचंद ढिग आयो।
गिरपति अपर हंडूरी आदिक
मिले आनि इक थायो ॥५॥
तुरक मुसाहिब साने मुखि जो
बैठे सरब सभा मैण।
शोक पराजै ते चित अुपजो
तजि अुतसाह तमामे ॥६॥
भाजि बचे जे मुरचे महि ते
सो ततकाल बुलाइ।
करन लगे दरियाफत तिन की
किस बिधि दुशमन आए? ॥७॥
किम आलम बहु करे दबावनिाफल है करि सोए।


१सारे सिंघां दी मनोण कामना देके श्री गुरू जी ने खुशी कीती।
२आपणी समीपता देके।

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