Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ३) १८७

१६. ।चेतो मसंद दा खोट। सग़ा॥१५ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ३ अगला अंसू>>१७
दोहरा: सिज़ख प्रवेशो अंतरे, प्रेम निरंतर धारि।
कलीधर दरसो तबहि, लखि सभ जग१ करतार ॥१॥
चौपई: -पारब्रहम की मूरति जोति-।
लखि करि२ सिख के प्रेम अुदोत।
परो चरन पर बंदन कीनि।
पुन सनमुख बैठो सुख लीन ॥२॥
क्रिपा धारि गुर म्रिदुल अलायो।
हे प्रिय सिख! हम हित का लायो?
सुनति हाथ जोरे तबि कहो।
अदभुत चूरा३ मैण कित लहो४ ॥३॥
लायक जानि आप के घर की।
प्रथम पठो मैण, प्रीती अुर की।
गुर कुदरति ते५ मम कर आयो।
रुचिर जराअु जरो दिपतायो ॥४॥
जबर जवाहर जिस पर जरे।
किस कारीगर ने शुभ करे।
अबि मन दरशन को ललचावा।
रहो न गयो आप चलि आवा ॥५॥
श्री गुर कहो न हम ने हेरा।
हुतो बिभूखन पठो जु तेरा।
किस को दयो? बतावनि करीऐ।
नहीण दुरावन तिसहि बिचरीअहि६ ॥६॥
७महांराज जी! महां मसंद।
जो गुर कार लेति है बिं्रद।


१जगत दा।२पारब्रहम दी जोत ही (इह) मूरत है ऐसा लखके।
३चूड़ा।
४वेखिआ सी।
५भाव आपदी शकती करके।
६अुसदा (नाम) लुकाअुण दी ना सोच करनी।
७सिख ने किहा।

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