Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ६) २५३

३३. ।भाई जीवन सिंघ बज़ध। जंग॥
३२ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ६ अगला अंसू>>३४
दोहरा: सभि सिंघन को संगि लै, अुदे सिंघ बल सूर।
गुरू निकट पद१ पाइ बड, जग महि जस भरपूर ॥१॥
भुजंग प्रयात छंद: सभै सिंघ सूरे जबै मार लीने।
पहारी मलेछैण बिलोकैण सु चीने२।
महां मोद धारो गुरू मारि लीनो।
फते आज होई, नहीण जानि दीनो ॥२॥
जिसी ने पहारी घनेरे खपाए।
चिरंकाल बीता महां जंग पाए।
घनी शाह की सैन जूझंति मारी।
किते मास बीते दियो खेद भारी ॥३॥
नहीण खेत ते हार लै के पधारे।
बडे केसरी चंद ते आदि मारे।बडो बीर थो पैणडखान बिदारा।
महां ओज ते तांहि को३ आज मारा ॥४॥
बडी दूं सैलान की सैल जोगा४।
अुजारी, प्रहारे जु थे बीर लोगा।
घने देश देशं जसं जाणहि गावैण।
धरैण त्रास जोधे नहीण नेर जावैण ॥५॥
लरंते चहो जो सदा जीत लेता।
अरे लाख बैरी नहीण पीठ देता।
सभै हिंदुवाना गुरू जानि मानै।
मरो आज सोअू घने बीर हानै ॥६॥
भयो जंग को अंत होतो हमेशा५।
रहै जीवतो भेड़ पावै विशेशा६।
कहैण आप महि यौण मलेछैण पहारी।


१मुरातबा।
२पहाड़ीआण ते मलेछां ने वेखके पछांिआण (कि गुरू है इहो)।
३अुस (गुरू) ळ।
४सैर करन दे लाइक पहाड़ी दून।
५हमेशां जंग जो हुंदा सी जो अज़ग मुज़का।
६जे जीणवदा रहिदा तां बड़ा भेड़ पाअुणदा।

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