Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १२) ४२२

५७. ।लखनौर मिज़ठा खूह लवाया। मामा जी आए॥
५६ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १२ अगला अंसू>>५८
दोहरा: अपर बारता कछु कहोण जिम बीती लखनौर।
बल सरीर ब्रिज़धति गुरू जो सभ जग सिरमौर ॥१॥
चौपई: ग्राम ननेड़ी निकटि अहै जिह।
घोघा नाम मसंद बसै तहि।
प्रथम गुरू जब तीरथ गए।
तब सो मिलो हुतो ढिग अए ॥२॥
कितिक समेण रहि संगगुग़ारा।
दरब लोभ बहु रिदे मझारा।
माता गुजरी की इक दासी।
सेवा करति रहति नित पासी ॥३॥
तिह बिरमाइ मूढ ले गयो।
पुन पाछे पछुतावति भयो।
जब लखनौर गुरू चलि आए।
सुनि करि चहित -लेअुण बखशाए- ॥४॥
खेलति हुते ब्रिंद मिलि बालि।
तहां आनि दरसे ततकाल।
हाथ जोरि निज अरग़ गुग़ारी।
मैण मसंद नित गुरु अनुसारी ॥५॥
आप बास कीनसि लखनौर।
नहि रहिबे की नीकी ठौर।
अलप सथान अजर महि जिन के।
कोठे छत छोटे थल तिन के ॥६॥
मम घर महि करुना करि चलो।
समा बितावहु बसि थल भलो।
सुनि गुर कहति भाअु अुर तेरे।
चलि हैण प्रथम लेहि जब हेरे१ ॥७॥
बिन असवारी है न पयाना।
पहुचहि जबिहूं आइ किकाना२।


१चलांगे तदोण, जदोण पहिलां (तेरा प्रेम) देख लवाणगे।
२जदोण घोड़ा (आनद पुरोण) आ जावेगा।

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