Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ४६१४९. ।मारतंड दी कथा, तुरक जगाती, कंनखल, ते गोइंदवाल ळ मुड़ना॥
४८ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १ अगला अंसू>>५०
दोहरा: सुनि प्रसंग संगति सरब श्री गुर अमर कि पास१।
पुन पूछो किमु भानु कौ भयो बरन धूम्रास२? ॥१॥
चौपई: श्री गुर कहति भए इतिहास+।
संगति सुनहु भई गति जास।
कज़सप रिखि अतिशै तप घाला।
जिस के भई भारजा जाला३ ॥२॥
जने दिती४ ने दैत कराल।
दनु५ ते दानव++ भए बिसाल।
बिनता६ ते खगपति७ जनमायो।
नाम गरुड़ बड बली सुहायो ॥३॥
कज़द्र८ ने पंनग९ अुपजाए।
इज़तादिक इसत्री समुदाए।
अदिती१० ते सभि देव भए हैण।
सुधा पान जे अमर थिए हैण११ ॥४॥
तिस अदिती के गरभ मझारा।
सूरज हुतो अपनि तनु धारा।
इक दिन ससि सुति बुध चलि आयो।
ब्रहमचारी को बेख बनायो ॥५॥
तप को तपत हुतो बन मांही।
भिज़छा हित आयहु तिस पांही।


१जी दे पासोण।
२धूंएण वरगा काला रंग सूरज दा हो गिआ सी।
+देखो इसे रास दे अंसू४८ दा अंक ८।
३बहुतीआण (इसत्रीआण)।
४दैणतां दी माता दा नाम है।
५कसप दी इक इसत्री जिस तोण ४० पुज़त्र होए जो दनुज कहाए।
++पा:-देवन।
६कसप दी होर इसत्री जो गरुड़ दी मां सी।
७गरुड़।
८कसप दी इक होर इसत्री दा नाम।
९सज़प।
१०कशप दी इक होर इसत्री जिस तोण ३३ देवते जंमे।
११अंम्रत पी के अमर (चिरंजीवी जाण कलप प्रयंत आयू वाले) होए हन।

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