Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति १) १०१

१२. ।बरात दी चड़्हाई॥
११ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति १ अगला अंसू>>१३
दोहरा: दिवस बाह को आइगो, तारी सकल कराइ।
साजी सकल बरात तबि, दे पोशिश सिरुपाइ ॥१॥
पाधड़ी छंद: श्री गुजरी रिद अनद धारि।
सतिगुरू पुज़त्र को ढिग हकारि।
चंदन सु चारु चौकी डसाइ।
बिच अजर महिद१ दीने बिठाइ ॥२॥
बर नारि सुहागण गीत गाइ।
चहुदिशिनि आनिपरवार पाइ२।
मरदनि करंति बटंा शरीर।
जिस मैण सुगंधि महिकति गहीर३ ॥३॥
सभि अंग रुचिर मरदो बनाइ।
भुजदंड गहे गज सुंड भाइ४।
पुन लाइ नीर नीके शनान।
मुख चंद पखारो रुचिर ठानि ॥४॥
पट पीत पहिर करि सकल अंग।
५कर बंधि कंगणा सगन संग।
शुभ बसत्र बिभूखन चारु डारि६।
सिरपेच७ सीस पर दुति अुदार ॥५॥
तिस अुपर जिगा बहु चमकवंति।
मुकता सु गोल हीरनि जरंति८।
सबग़े बिलद सबि जे सुहाइ।
लरकंति पंकती दुति बनाइ९ ॥६॥


१वेहड़े वज़डे विच।
२घेरा पाके।
३बहुत।
४हाथी दी सुंड वरगे भुजदंडे फड़के (वज़टंा मज़लिआ)।
५हज़थ।
६पाके।
७पज़ग, दसतार, चीरा ।
फा:, सरपेच॥।
८ते हीरिआण नाल जड़ी होई।
९वडे वडे पंने (ऐसे) सुहणे सन कि ओह सारे कतार बंनवीण सुंदरता नाल लटक रहे सन।

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