Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ६) १२८

१६. ।सिंघां दा रातीण हज़ला॥
१५ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ६ अगला अंसू>>१७
दोहरा: हुतो दूर कुछ लोहगड़, आनद पुरि ते सोइ।
ढुके मोरचे निकट तिहि, दिन प्रति ाफल होइ ॥१॥
ललितपद छंद: इक दिन निसा भई अंधिआरी
शेर सिंघ बच भाखा।
नाहर सिंघ जी! सवाधान बनि
सुनि मेरी अभिलाखा ॥२॥
श्री अनदपुरि ते कुछ अंतर,
नेर नहीण१ लखि सोअू।
यां ते निकट मोरचे लावति२
मन वधाइ सभि कोअू ॥३॥
अगम पुरे अरु होल गड़ी महि
अपरकेस गड़ सारे।
दूर दूर हैण सभि थल मुरचे
ढूके निकट हमारे३ ॥४॥
अबि निस महां अंधेर गुबारी
दुरजन ाफल भारे।
धरे भरोसा सुपत परे बहु
को इक जागन हारे ॥५॥
अूपर परहु क्रिपाननि ऐणचहु
करहु लथेर पथेरा।
एक वार करि करहु किनारा
परिहै रौर घनेरा ॥६॥
नहीण पछान परसपर होवै
कटहि परसपर सारे।
होति प्राति के करहि फरक४ फिर
निकट न आइ हमारे ॥७॥


१नेड़े नहीण है (साडा मोरचा लोह गड़्ह)।
२(वैरी) मोरचे नेड़े लिआ रहे हन।
३(इन्हां तोण तां) सभनी थाईण (वैरीआण दे) मोरचे दूर दूर हन (पर) साडे (इह) नेड़े आ ढुज़के
हन।
४भाव परे हो जाणगे (साथोण)।

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